पाठ-1 |आनुवंशिकता और उत्क्रांती | विज्ञान-2 |STD-10 |

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 आज हम आनुवांशिकता और उत्क्रांति पाठ के महत्त्वपूर्ण मुददों की जानकारी प्राप्त करे

आनुवांशिकता

   जनुको द्वारा माता- पिता के जैविक लक्षणों का उनके संतान में संक्रमित करने वाली प्रक्रिया को आनुवंशिकता कहते हैं।

 

महत्वपूर्ण वैज्ञानिकों का योगदान

 

1) वैज्ञानिक- ग्रेगर जोहान मेंडल

 

सन- 1886

 

विषय-आधुनिक आनुवंशिकी

 

खोज -मटर के पौधे पर अनेक प्रयोग करके आनुवंशिकता के विषय में निष्कर्ष खोज निकाला।

(2) वैज्ञानिक- ह्यूगो द व्हीस

सन -1901

विषय –उत्परिवर्तन का सिद्धांत

 

खोज -अचानक होने वाले उत्तपरिवर्तन का कारण समझाया |

(3) वैज्ञानिक- वाल्टर सटन

 सन -1902

विषय –गुणसूत्र का अध्ययन

 

खोज -टिड्डे की कोशिका में गुणसूत्रों को जोड़ियों के रूप में देखा।

 

(4) वैज्ञानिक –ओसवाल्ड एवरी, मैक्लिन मैक कार्थी तथा कॉलिन मैक्लॉयड

 

सन -1944

 

विषय- DNA  का अध्ययन करना

 

खोज -कुछ विषाणुओ को छोड़कर सभी सजीवो में डीएनए (DNA)ही एक अनुवांशिक सामग्री के रूप में होती है।

 

(5) वैज्ञानिक- फ्रैकाइस जेकब तथा जैक मोनाड़

 

सन- 1961

 

विषय-प्रथिन संश्लेषण

 

खोज -जीवाणुओं की कोशिका में डीएनए(DNA) द्वारा होने वाले प्रथिन संश्लेषण की प्रक्रिया की प्रतिकृति तैयार करना।

 

आनुवंशिक विज्ञान के लाभ

आनुवंशिक विकृतियों का..

1)निदान करने के लिए

2)प्रतिबंध एवं नियंत्रण करने के लिए

3)उपचार करने के लिए

4)प्राणी संकर और वनस्पतियों का संकर करने के लिए

आनुवंशिक विकृती(Genetical disorder)

गुणसूत्र की अपसामान्यता अथवा जनुको के उत्परिवर्तन के कारण जो विकार होते हैं, उन्हें आनुवांशिक विकार कहते हैं।

उदाहरण :

क्लाइन फेल्टर्स सिंड्रोम (गुणसूत्रों की संख्या में परिर्वतन से)

हिमोफिलिया,रतौधी(उत्परिवर्तन के कारण)

सेंट्रल डोग्मा

प्रथिन संश्लेषण की समस्त जानकारी डीएनए में संग्रहित होती है। शरीर के लिए प्रथिन निर्मिती का कार्य DNA द्वारा ,RNA के माध्यम से किया जाता है। इसे ही सेंट्रल डोग्मा कहते है।

 प्रतिलेखन

प्रथिन निर्मिती के दौरान RNA के बनने की प्रक्रिया को प्रतिलेखन कहते हैं।

 

ट्रिप्लेट कोडॉन

अमीनो अम्ल के लिए पाया जाने वाला संकेत (Code) तीन न्यूक्लियोटाईड के समुच्च के स्वरूप में होता है। इसी को ट्रिप्लेट कोडॉन कहते है।

 

भाषांतरण

m-RNA के ऊपर जिस प्रकार का  कोडॉन होता है उसके पूरक क्रम वाला एंटी कोडॉन,t-RNA पर होता है इस क्रिया को भाषांतरण कहते हैं।

 

 स्थानांतरण

जब राइबोसोम m-RNA के एक सिरे से दूसरे सिरे की ओर एक- एक ट्रिप्लेट कोडॉन के अंतर से सरकता है, तो उस समय होने वाले इस क्रिया को स्थानांतरण कहते हैं।

 

ध्यान देने योग्य

भारतीय वंश के डॉक्टर हरविंद खुराना इन्होंने 20 अमीनो अम्ल के लिए पाए जाने वाले कोडॉन की खोज की। इसके लिए इन्हें 1968 में अन्य दो वैज्ञानिकों के साथ नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ।

 

t-RNAके द्वारा लाए गए अमीनो अम्ल की पेप्टाइड बंध से श्रृंखला बनाने का कार्य r-RNA करता है।प्रथिनो की कई शृंखलाये एक साथ जुडकर जटिल प्रथिनो के अणु का निर्माण करती है|यही प्रथिन सजीव के शरीर मे विविध कार्य संपन्न करते है और उनके स्वरूप का नियंत्रण करते है।

 

उत्परिवर्तन

 न्यूक्लियोटाइड (जनुक में) के अचानक स्थान बदलने से जो परिवर्तन होता है,यही परिवर्तन उत्परिवर्तन कहलाता है।उत्परिवर्तन कभी सूक्ष्म  तो कभी लक्षणीय होती है। यह सतत चलने वाली अखंड प्रक्रिया है।

उदाहरण -सिकलसेल अनीमिया

 

उत्क्रांति

उत्क्रांति अर्थात सजीव में अत्यंत धीमी गति से होने वाला क्रमिक -परिवर्तन है ।यह प्रक्रिया अत्यंत धीमी एवं सजीवों का विकास साध्य करने वाली प्रक्रिया है।

 

उत्क्रांति का सिद्धांत

इस सिद्धांत के अनुसार प्रथम सजीव पदार्थ जीव द्रव्य है जो कि समुद्र में निर्मित हुआ।

आगे चलकर इस जीव द्रव्य से एक कोशिकीय  सजीवोँ का निर्माण हुआ।

काफी वर्षों तक एक कोशिकीय सजीवोँ के शरीर में परिवर्तन होते गया और उनसे जटिल सजीव का विकास हुआ। सर्वव्यापी रूप से यह बदलाव और विकास सजीव के सभी अंगों में धीरे-धीरे होता गया तथा इसी से अनेक प्रकार के सजीव अस्तित्व में आए। इसी कारण इस पूरी प्रक्रिया को क्रम -विकास अथवा संगठनात्मक उत्क्रांति है।

 

उत्क्रांति का प्रमाण

आकारिक प्रमाण या बाह्यरूपिकीय प्रमाण

इस प्रमाण के अंतर्गत शरीर के बाहरी अंगों जैसे मुख रचना ,आंखों का स्थान ,नाक के छिद्र ,कान की रचना में  समानता पाई जाती हैं। इसी कारण उनका उद्गमन समान है तथा वे एक ही पूर्वज से उत्क्रांतित हुए होंगे यह सिद्ध होता है।

 

शरीर विज्ञान का प्रमाण (अंतर्रचना का प्रमाण)

इस प्रमाण के अंतर्गत शरीर के आंतरिक अंगों के बनावट में समानता पाई जाती है। यह समानता उनके पूर्वज समान होंगे इस ओर दिशा -निर्देश करती है।

अवशेषांग

सजीव मे अकार्यक्षम अंग जो कोई भी कार्य नहीं कर सकते हैं ऐसे अंगो  को अवशेषांग  कहते है। उदाहरण:

आंत्रपुच्छ, अक्कल दाढ़, मेरुदंड की अंतिम चार कशेरुकाये, शरीर के बाल

 

संयोजी कड़ी

कुछ वनस्पति और प्राणियों में कुछ शारीरिक लक्षण इस प्रकार होते हैं कि उनकी सहायता से उनका दूसरे दो भिन्न समूहों से संबंध जोड़ा जाता है :,इसीलिए उन्हें संयोजी कड़ी कहते हैं।

उदाहरण:

पेरी पैटस यह एनीलिडा और संधि पाद इन दोनों प्राणियों को जोड़ने वाली संयोजी कड़ी है।

 

डार्विन के प्राकृतिक चयन का सिद्धांत

इस सिद्धांत के अनुसार जो सक्षम होता है वही अपने अस्तित्व को बनाए रखता है। प्रकृति में केवल अनुकूल सजीव  ही जीवित रहता है बाकी सब नष्ट हो जाते हैं। जीवित सजीव पुनरूत्पादन कर सकते हैं तथा अपनी भिन्न विशेषताओं के साथ नई प्रजाति का निर्माण करते है। Origin of species नामक पुस्तिका मे डार्विन द्वारा स्पष्टीकरण देने के लिए लिखी गई।



डार्विन के प्राकृतिक चयन का सिद्धांत के विरोध में दिए गए कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे

उत्क्रांति का आधार सिर्फ प्राकृतिक चयन को नहीं माना जा सकता है।

ऐसे कई सारे निरोपयोगी और उपयोगी परिवर्तनों का कारण डार्विन द्वारा नहीं बताया गया।

धीमी गति से होने वाली परिवर्तन तथा तीव्र गति से होने वाले परिवर्तन इन का उल्लेख नहीं किया गया।

 

लैमार्कवाद

उपार्जित विशेषताएं एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में संक्रमित होती है ,यही उपार्जित परिवर्तन के संक्रमण का सिद्धांत, लैमार्कवाद का सिद्धांत कहलाता है।

उदाहरण:

पीढ़ी दर पीढ़ी जिराफ अपनी गर्दन तानकर पेड़ों की ऊपर की पत्तियां खाने के कारण लंबी गर्दन वाला बना|

शुतुरमुर्ग, इमू आदि पक्षियों के पंख उपयोग में न लाने के कारण कमजोर हुए।

 

हंस , बत्तखों के पैर पानी में रहने से तैरने योग्य हुए अथवा साँप अपने बिल में जाने योग्य संरचना करते-करते अपने पैर गवा दिए।

 

संपादित गुणों का अनुवंश

सजीव के जीवन काल में जो विशेषताएं उन्होंने संपादित की है ,वह संतान की ओर संक्रमित हो सकती है इसे ही संपादित गुणों का अनुवंश कहते हैं

 

जाति

प्राणी और वनस्पतियों की विभिन्न जातियों का निर्माण यह उत्क्रांति का ही एक परिणाम है |प्राकृतिक निषेचन द्वारा स्वयं संतान निर्माण कर सकने वाले सजीव के समूह को जाति कहते हैं।

 

जाति उद्भव

पूर्व की जाति द्वारा नई जाति के उत्पन्न होने की प्रक्रिया को जाति उद्भवन कहते है।

 

मानव विकास की अलग-अलग अवस्थाएं तथा कालखंड

 

 1)प्राचीन प्राणी जैसे लेम्यूर……..700,00000 वर्ष पूर्व

 

2)इजिप्तोपिथिकस …….4,00,00000 वर्ष पूर्व

 

3)ड्रायोपिथिकस……2,50,00000 वर्ष पूर्व

 

4)रामापिथिकस(सबसे पहली अभिलिखित)…..1,00,00000 वर्ष पूर्व

 

5)ऑस्ट्रेलोपिथिकस….40,00000 वर्ष पूर्व

 

6)कुशल मानव……20,00000 वर्ष पूर्व

 

7)सीधा खड़ा चलने वाला मानव…15,00,000 वर्ष पूर्व

 

8)नियंडर थाल मानव(बुद्धिमान मानव)….1,50,000 वर्ष पूर्व

 

9)क्रो मैग्नन मानव अथवा क्रो मान्या मानव….50,000 वर्ष पूर्व

 

 

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